रविओ गांव में 2 हजार लीटर महुआ घोल नष्ट: 100 लीटर शराब जब्त, पुलिस ने भट्ठी और सामग्री को आग के हवाले किया नई दिल्ली: शुक्रवार को जारी UNESCO की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण भारत में 100 लड़कों के 11वीं और 12वीं यानी उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने पर सिर्फ 59 लड़कियां ही इस स्तर की पढ़ाई पूरी कर पाती हैं. रिपोर्ट में बताया गया है कि शहरों में लड़के और लड़कियों के बीच बराबरी की दिशा में प्रगति के बावजूद, ग्रामीण इलाकों में स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के मामले में बड़ा अंतर है.

वारदात कैसे हुई और कैसे खुला राज

रविओ गांव में 2 हजार लीटर महुआ घोल नष्ट: 100 लीटर शराब जब्त, पुलिस ने भट्ठी और सामग्री को आग के हवाले किया

नई दिल्ली: शुक्रवार को जारी UNESCO की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण भारत में 100 लड़कों के 11वीं और 12वीं यानी उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने पर सिर्फ 59 लड़कियां ही इस स्तर की पढ़ाई पूरी कर पाती हैं. रिपोर्ट में बताया गया है कि शहरों में लड़के और लड़कियों के बीच बराबरी की दिशा में प्रगति के बावजूद, ग्रामीण इलाकों में स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के मामले में बड़ा अंतर है.

‘Gender Equity in Access to Education’ नाम की इस रिपोर्ट में 31 निम्न और मध्यम आय वाले देशों में शिक्षा में लड़के-लड़कियों के बीच के अंतर का अध्ययन किया गया है. भारत में उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने का समायोजित जेंडर पैरिटी इंडेक्स कुल मिलाकर 0.89, ग्रामीण इलाकों में 0.59 और शहरी इलाकों में 1.0 है.

कुल मिलाकर उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने का आंकड़ा 0.89 होने का मतलब है कि 100 लड़कों के इस स्तर की पढ़ाई पूरी करने पर करीब 89 लड़कियां भी ऐसा करती हैं.

ग्रामीण इलाकों में यह आंकड़ा घटकर 100 लड़कों पर 59 लड़कियों का रह जाता है, जबकि शहरी इलाकों में लड़के और लड़कियां बराबरी पर पहुंच गए हैं.

जेंडर पैरिटी इंडेक्स 1 होने का मतलब है कि लड़कियों और लड़कों के नतीजे बराबर हैं.

भारत के मामले में ग्रामीण इलाकों का आंकड़ा बताता है कि उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने वाली लड़कियों और लड़कों के अनुपात में बड़ा अंतर है.

रिपोर्ट बताती है कि देश के स्तर पर हुई प्रगति अलग-अलग समूहों के बीच मौजूद अंतर को छिपा सकती है. इसमें कहा गया है, “जेंडर बराबरी की दिशा में हुई प्रगति का मतलब यह नहीं है कि बच्चों के सभी समूहों को इस बदलाव का बराबर फायदा मिल रहा है.”

पुलिस जांच व बरामदगी: क्या आया सामने

  • •रविओ गांव में 2 हजार लीटर महुआ घोल नष्ट: 100 लीटर शराब जब्त, पुलिस ने भट्ठी और सामग्री को आग के हवाले किया
  • •नई दिल्ली: शुक्रवार को जारी UNESCO की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण भारत में 100 लड़कों के 11वीं और 12वीं यानी उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने पर सिर्फ 59 लड़कियां ही इस स्तर की पढ़ाई पूरी कर पाती हैं. रिपोर्ट में बताया गया है कि शहरों में लड़के और लड़कियों के बीच बराबरी की दिशा में प्रगति के बावजूद, ग्रामीण इलाकों में स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के मामले में बड़ा अंतर है.
  • •‘Gender Equity in Access to Education’ नाम की इस रिपोर्ट में 31 निम्न और मध्यम आय वाले देशों में शिक्षा में लड़के-लड़कियों के बीच के अंतर का अध्ययन किया गया है. भारत में उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने का समायोजित जेंडर पैरिटी इंडेक्स कुल मिलाकर 0.89, ग्रामीण इलाकों में 0.59 और शहरी इलाकों में 1.0 है.
  • •कुल मिलाकर उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने का आंकड़ा 0.89 होने का मतलब है कि 100 लड़कों के इस स्तर की पढ़ाई पूरी करने पर करीब 89 लड़कियां भी ऐसा करती हैं.
  • •ग्रामीण इलाकों में यह आंकड़ा घटकर 100 लड़कों पर 59 लड़कियों का रह जाता है, जबकि शहरी इलाकों में लड़के और लड़कियां बराबरी पर पहुंच गए हैं.
  • •जेंडर पैरिटी इंडेक्स 1 होने का मतलब है कि लड़कियों और लड़कों के नतीजे बराबर हैं.
  • •भारत के मामले में ग्रामीण इलाकों का आंकड़ा बताता है कि उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने वाली लड़कियों और लड़कों के अनुपात में बड़ा अंतर है.
  • •रिपोर्ट बताती है कि देश के स्तर पर हुई प्रगति अलग-अलग समूहों के बीच मौजूद अंतर को छिपा सकती है. इसमें कहा गया है, “जेंडर बराबरी की दिशा में हुई प्रगति का मतलब यह नहीं है कि बच्चों के सभी समूहों को इस बदलाव का बराबर फायदा मिल रहा है.”
  • •रिपोर्ट में 2020-24 के आंकड़ों के आधार पर 31 निम्न और मध्यम आय वाले देशों में जगह और परिवार की आर्थिक स्थिति के हिसाब से उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने के अंतर का अध्ययन किया गया है. इसमें कहा गया है कि जिन देशों में लड़कियां पीछे हैं, वहां जेंडर पैरिटी इंडेक्स का औसत 0.87 था. ग्रामीण इलाकों में यह 0.74 रह गया, जबकि शहरी इलाकों में यह 0.96 था.
  • •भारत भी इस बड़े पैटर्न को दिखाता है. ग्रामीण इलाकों में लड़कियां काफी पीछे हैं, जबकि शहरी इलाकों में लड़के और लड़कियां बराबरी पर पहुंच चुके हैं.
  • •भारत में ग्रामीण और शहरी इलाकों के बीच का अंतर स्कूल में दाखिले के आंकड़ों में भी दिखाई देता है. ASER 2024 की रिपोर्ट के मुताबिक, 15-16 साल की ग्रामीण लड़कियों में 8.1 प्रतिशत स्कूल में दाखिला नहीं लेती थीं. 2022 में यह आंकड़ा 7.9 प्रतिशत था. हालांकि ये आंकड़े पढ़ाई पूरी करने के बजाय उस समय स्कूल में दाखिले की स्थिति बताते हैं, लेकिन इससे पता चलता है कि बड़ी उम्र की लड़कियों को शिक्षा से जोड़े रखना अभी भी एक चुनौती है.
  • •UNESCO की रिपोर्ट में पाया गया कि जिन देशों में लड़कियों को शिक्षा में नुकसान का सामना करना पड़ता है, वहां सबसे गरीब परिवारों में जेंडर पैरिटी इंडेक्स का औसत 0.66 था. इसके मुकाबले सबसे अमीर 20 प्रतिशत परिवारों में यह 0.92 था. इससे पता चलता है कि गरीबी शिक्षा में लड़के-लड़कियों के बीच का अंतर बढ़ाती है.
  • •हालांकि, रिपोर्ट शिक्षा तक पहुंच में अलग-अलग तरह की परेशानियों के एक साथ असर की ओर भी ध्यान दिलाती है. इसमें कहा गया है, “शिक्षा तक पहुंच में जेंडर का अंतर सिर्फ लोगों की व्यक्तिगत पसंद की वजह से नहीं होता, बल्कि राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्थाओं के साथ-साथ शिक्षा से जुड़ी नीतियों और तरीकों की वजह से भी होता है, जो बच्चों, किशोरों और युवाओं को बाहर कर देते हैं.”
  • •रिपोर्ट के मुताबिक, इन अंतर को “लिंग और गरीबी, भौगोलिक स्थिति और किसी सामाजिक या जनसांख्यिकीय समूह का हिस्सा होने से जुड़े नियमों जैसे कारकों के बीच संबंध” के जरिए बेहतर तरीके से समझा जा सकता है.
  • •रिपोर्ट में कहा गया है कि लड़कियों की शिक्षा तक पहुंच बेहतर करने के लिए उन व्यावहारिक रुकावटों को दूर करना जरूरी है, जो उन्हें स्कूल में दाखिला लेने, नियमित रूप से स्कूल जाने और अपनी पढ़ाई पूरी करने से रोकती हैं. इनमें आने-जाने का खर्च, स्कूल में सुरक्षा की कमी, पर्याप्त शौचालय सुविधाओं का न होना और गर्भावस्था या कम उम्र में शादी की वजह से स्कूल छोड़ने वाली लड़कियों को मदद न मिलना शामिल है.
  • •रिपोर्ट में भारत से जुड़े शोध का भी इस्तेमाल किया गया है, ताकि लक्षित योजनाओं के असर को बताया जा सके. UNESCO की ओर से जिन अध्ययनों का हवाला दिया गया है, उनमें पाया गया कि देशभर में शौचालय बनाने की पहल से किशोरियों के स्कूल में दाखिले में बढ़ोतरी हुई, खासकर उन इलाकों में जहां लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालय बनाए गए थे.
  • •भारत में हुए शोध से यह भी पता चलता है कि स्कूल में कम उम्र से और लगातार मिलने वाले मिड-डे मील से पढ़ाई छोड़ने की दर कम होती है, खासकर लड़कियों में. कर्नाटक के 121 गांवों में किए गए एक रैंडमाइज्ड ट्रायल में पाया गया कि स्थानीय क्लबों की ओर से लड़कियों को जीवन से जुड़ी जरूरी बातें सीखने और सामाजिक संबंध बनाने के मौके देने से माध्यमिक स्कूल की पढ़ाई पूरी करने में थोड़ी मदद मिली. हालांकि, कम उम्र में शादी अभी भी एक चिंता बनी रही.
  • •रिपोर्ट में नेपाल का उदाहरण दिया गया है कि लगातार लागू की गई नीतियां जेंडर के अंतर को कैसे कम कर सकती हैं. नेपाल में लड़कियों के माध्यमिक शिक्षा पूरी करने का आंकड़ा 1990 में 8 प्रतिशत से बढ़कर 2024 में 89 प्रतिशत हो गया और लड़के-लड़कियां बराबरी पर पहुंच गए. UNESCO के मुताबिक, इस प्रगति की एक वजह ऐसे कानून हैं, जो मुफ्त और अनिवार्य बुनियादी शिक्षा की गारंटी देते हैं. इसके अलावा लक्षित छात्रवृत्ति, स्कूल की बेहतर सुविधाएं और परीक्षा में किए गए ऐसे बदलाव भी इसकी वजह रहे, जिनसे ऊंची कक्षाओं में जाना आसान हुआ.
  • •हालांकि, रिपोर्ट ने यह भी चेतावनी दी है कि अगर दूसरी रुकावटें बनी रहती हैं तो सिर्फ एक योजना या कदम पर्याप्त नहीं हो सकता. इसमें कहा गया है, “अगर आने-जाने का खर्च बहुत ज्यादा है तो फीस खत्म करने से शिक्षा मुफ्त नहीं हो जाती. अगर स्कूल सुरक्षित नहीं हैं तो छात्रवृत्ति का ज्यादा फायदा नहीं होता. अगर कम उम्र की मांओं के पास बच्चों की देखभाल की सुविधा नहीं है तो दोबारा स्कूल में दाखिला देने की नीतियां प्रभावी नहीं हो सकतीं.”
  • •(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
  • •यह भी पढ़ें: देश में कॉलेज-यूनिवर्सिटी की संख्या तो बढ़ीं लेकिन UP, बिहार और झारखंड में अब भी बड़ी कमी: स्टडी
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कानूनी कार्रवाई और आरोपियों की वर्तमान स्थिति

रिपोर्ट में 2020-24 के आंकड़ों के आधार पर 31 निम्न और मध्यम आय वाले देशों में जगह और परिवार की आर्थिक स्थिति के हिसाब से उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने के अंतर का अध्ययन किया गया है. इसमें कहा गया है कि जिन देशों में लड़कियां पीछे हैं, वहां जेंडर पैरिटी इंडेक्स का औसत 0.87 था. ग्रामीण इलाकों में यह 0.74 रह गया, जबकि शहरी इलाकों में यह 0.96 था.

भारत भी इस बड़े पैटर्न को दिखाता है. ग्रामीण इलाकों में लड़कियां काफी पीछे हैं, जबकि शहरी इलाकों में लड़के और लड़कियां बराबरी पर पहुंच चुके हैं.

भारत में ग्रामीण और शहरी इलाकों के बीच का अंतर स्कूल में दाखिले के आंकड़ों में भी दिखाई देता है. ASER 2024 की रिपोर्ट के मुताबिक, 15-16 साल की ग्रामीण लड़कियों में 8.1 प्रतिशत स्कूल में दाखिला नहीं लेती थीं. 2022 में यह आंकड़ा 7.9 प्रतिशत था. हालांकि ये आंकड़े पढ़ाई पूरी करने के बजाय उस समय स्कूल में दाखिले की स्थिति बताते हैं, लेकिन इससे पता चलता है कि बड़ी उम्र की लड़कियों को शिक्षा से जोड़े रखना अभी भी एक चुनौती है.

UNESCO की रिपोर्ट में पाया गया कि जिन देशों में लड़कियों को शिक्षा में नुकसान का सामना करना पड़ता है, वहां सबसे गरीब परिवारों में जेंडर पैरिटी इंडेक्स का औसत 0.66 था. इसके मुकाबले सबसे अमीर 20 प्रतिशत परिवारों में यह 0.92 था. इससे पता चलता है कि गरीबी शिक्षा में लड़के-लड़कियों के बीच का अंतर बढ़ाती है.

हालांकि, रिपोर्ट शिक्षा तक पहुंच में अलग-अलग तरह की परेशानियों के एक साथ असर की ओर भी ध्यान दिलाती है. इसमें कहा गया है, “शिक्षा तक पहुंच में जेंडर का अंतर सिर्फ लोगों की व्यक्तिगत पसंद की वजह से नहीं होता, बल्कि राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्थाओं के साथ-साथ शिक्षा से जुड़ी नीतियों और तरीकों की वजह से भी होता है, जो बच्चों, किशोरों और युवाओं को बाहर कर देते हैं.”

रिपोर्ट के मुताबिक, इन अंतर को “लिंग और गरीबी, भौगोलिक स्थिति और किसी सामाजिक या जनसांख्यिकीय समूह का हिस्सा होने से जुड़े नियमों जैसे कारकों के बीच संबंध” के जरिए बेहतर तरीके से समझा जा सकता है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि लड़कियों की शिक्षा तक पहुंच बेहतर करने के लिए उन व्यावहारिक रुकावटों को दूर करना जरूरी है, जो उन्हें स्कूल में दाखिला लेने, नियमित रूप से स्कूल जाने और अपनी पढ़ाई पूरी करने से रोकती हैं. इनमें आने-जाने का खर्च, स्कूल में सुरक्षा की कमी, पर्याप्त शौचालय सुविधाओं का न होना और गर्भावस्था या कम उम्र में शादी की वजह से स्कूल छोड़ने वाली लड़कियों को मदद न मिलना शामिल है.

रिपोर्ट में भारत से जुड़े शोध का भी इस्तेमाल किया गया है, ताकि लक्षित योजनाओं के असर को बताया जा सके. UNESCO की ओर से जिन अध्ययनों का हवाला दिया गया है, उनमें पाया गया कि देशभर में शौचालय बनाने की पहल से किशोरियों के स्कूल में दाखिले में बढ़ोतरी हुई, खासकर उन इलाकों में जहां लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालय बनाए गए थे.

भारत में हुए शोध से यह भी पता चलता है कि स्कूल में कम उम्र से और लगातार मिलने वाले मिड-डे मील से पढ़ाई छोड़ने की दर कम होती है, खासकर लड़कियों में. कर्नाटक के 121 गांवों में किए गए एक रैंडमाइज्ड ट्रायल में पाया गया कि स्थानीय क्लबों की ओर से लड़कियों को जीवन से जुड़ी जरूरी बातें सीखने और सामाजिक संबंध बनाने के मौके देने से माध्यमिक स्कूल की पढ़ाई पूरी करने में थोड़ी मदद मिली. हालांकि, कम उम्र में शादी अभी भी एक चिंता बनी रही.

रिपोर्ट में नेपाल का उदाहरण दिया गया है कि लगातार लागू की गई नीतियां जेंडर के अंतर को कैसे कम कर सकती हैं. नेपाल में लड़कियों के माध्यमिक शिक्षा पूरी करने का आंकड़ा 1990 में 8 प्रतिशत से बढ़कर 2024 में 89 प्रतिशत हो गया और लड़के-लड़कियां बराबरी पर पहुंच गए. UNESCO के मुताबिक, इस प्रगति की एक वजह ऐसे कानून हैं, जो मुफ्त और अनिवार्य बुनियादी शिक्षा की गारंटी देते हैं. इसके अलावा लक्षित छात्रवृत्ति, स्कूल की बेहतर सुविधाएं और परीक्षा में किए गए ऐसे बदलाव भी इसकी वजह रहे, जिनसे ऊंची कक्षाओं में जाना आसान हुआ.

हालांकि, रिपोर्ट ने यह भी चेतावनी दी है कि अगर दूसरी रुकावटें बनी रहती हैं तो सिर्फ एक योजना या कदम पर्याप्त नहीं हो सकता. इसमें कहा गया है, “अगर आने-जाने का खर्च बहुत ज्यादा है तो फीस खत्म करने से शिक्षा मुफ्त नहीं हो जाती. अगर स्कूल सुरक्षित नहीं हैं तो छात्रवृत्ति का ज्यादा फायदा नहीं होता. अगर कम उम्र की मांओं के पास बच्चों की देखभाल की सुविधा नहीं है तो दोबारा स्कूल में दाखिला देने की नीतियां प्रभावी नहीं हो सकतीं.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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