रिपोर्ट-- दस साल में इंसान का पांच फीसदी काम ही छीन पाएगा एआई, National Hindi News बदलाव: अमेरिकी शेयर बाजार में 1721% तक बढ़ीं नौकरियां, एआई के नैतिक और सुरक्षात्मक दायरे तय करने की जिम्मेदारी
बाजार और अर्थव्यवस्था: क्या हुआ बड़ा बदलाव?
रिपोर्ट-- दस साल में इंसान का पांच फीसदी काम ही छीन पाएगा एआई, National Hindi News
बदलाव: अमेरिकी शेयर बाजार में 1721% तक बढ़ीं नौकरियां, एआई के नैतिक और सुरक्षात्मक दायरे तय करने की जिम्मेदारी
‘10 साल बाद भी रहेगी पैसों की अहमियत’, एलन मस्क की बातों को सैम ऑल्टमैन ने किया खारिज, बताया अपना सबसे बड़ा डर
कृत्रिम बुद्धिमत्ता उत्पादकता को बढ़ावा देती है, जिससे कौशल संबंधी समस्या की परिभाषा बदल जाती है।
भारतीय युवाओं के लिए कॉलेज की डिग्री हासिल करना कॉर्पोरेट करियर की तरफ पहला कदम माना जाता था. लेकिन अब लाखों ग्रेजुएट्स के लिए असली परीक्षा कॉलेज खत्म होने के बाद शुरू हो रही है, पहली नौकरी पाना! यह समस्या विशेष रूप से टेक्नोलॉजी और फाइनेंशियल सर्विसेज सेक्टर में सबसे ज्यादा दिख रही है, जहां कंपनियां उन कामों के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल कर रही हैं जो कभी युवा कर्मचारियों को उनका पहला अनुभव देते थे.
डॉक्यूमेंट्स की जांच, लोन प्रोसेसिंग, खातों का मिलान, इनवॉइस तैयार करना और बुनियादी कोडिंग लिखना जैसे काम अब एआई टूल्स के जरिए तेजी से किए जा रहे हैं. इसका नतीजा यह है कि हर साल वर्कफोर्स में शामिल होने वाले लाखों युवाओं के सामने एंट्री-लेवल (शुरुआती स्तर) की नौकरियां लगातार घट रही हैं.
'डर है कि AI शुरुआती नौकरियां खत्म न कर दे' क्या बोले युवा
डीवाई पाटिल यूनिवर्सिटी से इसी साल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने वाली 22 वर्षीय पूर्वा जगताप उन्हीं लाखों युवाओं में से एक हैं. डिग्री पूरी करने के बाद उन्हें देश के टेक सेक्टर में नौकरी मिलने की उम्मीद थी, लेकिन अब वे अपना पूरा समय दर्जनों जगह अप्लाई करने और हजारों उम्मीदवारों से प्रतिस्पर्धा करने में बिता रही हैं.
प्रमुख वित्तीय आंकड़े और कंपनियों का रुख
- •रिपोर्ट-- दस साल में इंसान का पांच फीसदी काम ही छीन पाएगा एआई, National Hindi News
- •बदलाव: अमेरिकी शेयर बाजार में 1721% तक बढ़ीं नौकरियां, एआई के नैतिक और सुरक्षात्मक दायरे तय करने की जिम्मेदारी
- •‘10 साल बाद भी रहेगी पैसों की अहमियत’, एलन मस्क की बातों को सैम ऑल्टमैन ने किया खारिज, बताया अपना सबसे बड़ा डर
- •कृत्रिम बुद्धिमत्ता उत्पादकता को बढ़ावा देती है, जिससे कौशल संबंधी समस्या की परिभाषा बदल जाती है।
- •भारतीय युवाओं के लिए कॉलेज की डिग्री हासिल करना कॉर्पोरेट करियर की तरफ पहला कदम माना जाता था. लेकिन अब लाखों ग्रेजुएट्स के लिए असली परीक्षा कॉलेज खत्म होने के बाद शुरू हो रही है, पहली नौकरी पाना! यह समस्या विशेष रूप से टेक्नोलॉजी और फाइनेंशियल सर्विसेज सेक्टर में सबसे ज्यादा दिख रही है, जहां कंपनियां उन कामों के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल कर रही हैं जो कभी युवा कर्मचारियों को उनका पहला अनुभव देते थे.
- •डॉक्यूमेंट्स की जांच, लोन प्रोसेसिंग, खातों का मिलान, इनवॉइस तैयार करना और बुनियादी कोडिंग लिखना जैसे काम अब एआई टूल्स के जरिए तेजी से किए जा रहे हैं. इसका नतीजा यह है कि हर साल वर्कफोर्स में शामिल होने वाले लाखों युवाओं के सामने एंट्री-लेवल (शुरुआती स्तर) की नौकरियां लगातार घट रही हैं.
- •'डर है कि AI शुरुआती नौकरियां खत्म न कर दे' क्या बोले युवा
- •डीवाई पाटिल यूनिवर्सिटी से इसी साल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने वाली 22 वर्षीय पूर्वा जगताप उन्हीं लाखों युवाओं में से एक हैं. डिग्री पूरी करने के बाद उन्हें देश के टेक सेक्टर में नौकरी मिलने की उम्मीद थी, लेकिन अब वे अपना पूरा समय दर्जनों जगह अप्लाई करने और हजारों उम्मीदवारों से प्रतिस्पर्धा करने में बिता रही हैं.
- •युवाओं की चिंता: पूर्वा ने बताया, 'मुझे इस बात की चिंता है कि एआई शुरुआती स्तर की नौकरियों की संख्या को कम कर सकता है, क्योंकि यह कई कामों को इंसानों से बहुत तेजी से कर सकता है.'
- •एक अन्य छात्र ने कहा कि भारत के लिए यह संकट इसलिए भी बड़ा है क्योंकि देश का आईटी उद्योग लगभग 60 लाख लोगों को रोजगार देता है और अर्थव्यवस्था में लगभग 8 फीसदी का योगदान देता है.
- •जिनोव-नैसकॉम की 2026 रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें से करीब 24 लाख लोग ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) में काम करते हैं. बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे जैसे शहरों में दिग्गज विदेशी बैंकों और कंपनियों के ये सेंटर्स युवाओं के लिए नौकरियां पैदा करते रहे हैं, लेकिन अब वे भी बहुत सोच-समझकर भर्ती कर रहे हैं.
- •TCS और इन्फोसिस में सुस्त हुई हायरिंग, 2030 तक 30% काम होगा ऑटोमेट!
- •भारत के विशाल आईटी सेवा उद्योग पर एआई का असर अब खुलकर सामने आ रहा है. मैकिंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट का अनुमान है कि 2030 तक भारत में नौकरियों के करीब 30% जॉब ऑवर्स ऑटोमेट किए जा सकते हैं. आईएनजी (ING) की रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार, चालू वित्त वर्ष के शुरुआती 9 महीनों में देश की शीर्ष आईटी कंपनियों ने नेट बेसिस पर केवल 17 नए कर्मचारियों को ही जोड़ा है. यह उस उद्योग के लिए बहुत बड़ा झटका है जो कैंपस प्लेसमेंट के जरिए हजारों फ्रेशर्स को उठाता था.
- •इन्फोसिस ने पिछले साल सैकड़ों प्रशिक्षुओं (Trainees) के कॉन्ट्रैक्ट समाप्त किए थे, जबकि टीसीएस (TCS) ने दुनिया भर में 12,000 नौकरियों में कटौती की योजना की घोषणा की, जिसका बड़ा हिस्सा भारत में है. Naukri.com की पैरेंट कंपनी इंफो एज के सीईओ हितेश ओबेरॉय ने कहा, 'बड़ी आईटी कंपनियां पारंपरिक रूप से कैंपसों में जाकर बड़ी संख्या में युवा ग्रेजुएट्स को हायर करती थीं. अब वह हायरिंग काफी हद तक सुस्त पड़ गई है.'
- •'एआई स्किल्स' की मांग, लेकिन एक्सपीरियंस के बिना नौकरी कैसे?
- •आईटी ही नहीं, सेल्स, फाइनेंस, मार्केटिंग और कस्टमर सपोर्ट जैसे क्षेत्रों में भी रूटीन नौकरियों पर संकट है. क्वेस कॉर्प की रिपोर्ट के मुताबिक, एआई-आधारित एनालिटिक्स के आने से सप्लाई चेन और प्रोक्योरमेंट के पदों में करीब 42% तक की गिरावट देखी गई है. छात्रों के लिए यह एक मुश्किल चक्र (Vicious Cycle) बन गया है
- •कंपनियां अब ऐसे उम्मीदवार चाहती हैं जिन्हें एआई, क्लाउड कंप्यूटिंग, साइबर सिक्योरिटी या मशीन लर्निंग की समझ हो. समस्या यह है कि फ्रेशर्स को वह अनुभव हासिल करने के लिए भी पहली नौकरी की जरूरत होती है, जो उन्हें मिल नहीं रही.
- •कम लोग, ज्यादा काम: जीसीसी सर्विसेज फर्म ANSR के सीईओ ललित आहूजा के अनुसार, जिस टेक्नोलॉजी प्रोजेक्ट को पहले एक साल में 50 इंजीनियर्स की टीम पूरा करती थी, अब उसे एआई की मदद से 4 से 10 लोग महज चार हफ्ते में पूरा कर लेते हैं.
- •इस पूरे बदलाव का मतलब यह नहीं है कि नौकरियां पूरी तरह खत्म हो गई हैं, बल्कि कंपनियां अब ज्यादा स्पेशलाइज्ड रोल्स के लिए ही भर्तियां कर रही हैं. उदाहरण के लिए, सिटीग्रुप ने इस साल अपने भारतीय जीसीसी ऑपरेशन्स के लिए नेट बेसिस पर करीब 2,000 लोगों को भर्ती किया है, जबकि पिछले साल यह आंकड़ा 4,000 था.
- •स्पष्ट है कि भारतीय युवाओं के लिए अब केवल एक पारंपरिक डिग्री होना काफी नहीं है; उन्हें एआई के इस दौर में खुद को नए सिरे से री-स्किल करना ही होगा.
निवेशकों और उपभोक्ताओं के लिए जरूरी बातें
युवाओं की चिंता: पूर्वा ने बताया, 'मुझे इस बात की चिंता है कि एआई शुरुआती स्तर की नौकरियों की संख्या को कम कर सकता है, क्योंकि यह कई कामों को इंसानों से बहुत तेजी से कर सकता है.'
एक अन्य छात्र ने कहा कि भारत के लिए यह संकट इसलिए भी बड़ा है क्योंकि देश का आईटी उद्योग लगभग 60 लाख लोगों को रोजगार देता है और अर्थव्यवस्था में लगभग 8 फीसदी का योगदान देता है.
जिनोव-नैसकॉम की 2026 रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें से करीब 24 लाख लोग ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) में काम करते हैं. बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे जैसे शहरों में दिग्गज विदेशी बैंकों और कंपनियों के ये सेंटर्स युवाओं के लिए नौकरियां पैदा करते रहे हैं, लेकिन अब वे भी बहुत सोच-समझकर भर्ती कर रहे हैं.
TCS और इन्फोसिस में सुस्त हुई हायरिंग, 2030 तक 30% काम होगा ऑटोमेट!
भारत के विशाल आईटी सेवा उद्योग पर एआई का असर अब खुलकर सामने आ रहा है. मैकिंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट का अनुमान है कि 2030 तक भारत में नौकरियों के करीब 30% जॉब ऑवर्स ऑटोमेट किए जा सकते हैं. आईएनजी (ING) की रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार, चालू वित्त वर्ष के शुरुआती 9 महीनों में देश की शीर्ष आईटी कंपनियों ने नेट बेसिस पर केवल 17 नए कर्मचारियों को ही जोड़ा है. यह उस उद्योग के लिए बहुत बड़ा झटका है जो कैंपस प्लेसमेंट के जरिए हजारों फ्रेशर्स को उठाता था.
इन्फोसिस ने पिछले साल सैकड़ों प्रशिक्षुओं (Trainees) के कॉन्ट्रैक्ट समाप्त किए थे, जबकि टीसीएस (TCS) ने दुनिया भर में 12,000 नौकरियों में कटौती की योजना की घोषणा की, जिसका बड़ा हिस्सा भारत में है. Naukri.com की पैरेंट कंपनी इंफो एज के सीईओ हितेश ओबेरॉय ने कहा, 'बड़ी आईटी कंपनियां पारंपरिक रूप से कैंपसों में जाकर बड़ी संख्या में युवा ग्रेजुएट्स को हायर करती थीं. अब वह हायरिंग काफी हद तक सुस्त पड़ गई है.'
'एआई स्किल्स' की मांग, लेकिन एक्सपीरियंस के बिना नौकरी कैसे?
आईटी ही नहीं, सेल्स, फाइनेंस, मार्केटिंग और कस्टमर सपोर्ट जैसे क्षेत्रों में भी रूटीन नौकरियों पर संकट है. क्वेस कॉर्प की रिपोर्ट के मुताबिक, एआई-आधारित एनालिटिक्स के आने से सप्लाई चेन और प्रोक्योरमेंट के पदों में करीब 42% तक की गिरावट देखी गई है. छात्रों के लिए यह एक मुश्किल चक्र (Vicious Cycle) बन गया है
कंपनियां अब ऐसे उम्मीदवार चाहती हैं जिन्हें एआई, क्लाउड कंप्यूटिंग, साइबर सिक्योरिटी या मशीन लर्निंग की समझ हो. समस्या यह है कि फ्रेशर्स को वह अनुभव हासिल करने के लिए भी पहली नौकरी की जरूरत होती है, जो उन्हें मिल नहीं रही.
कम लोग, ज्यादा काम: जीसीसी सर्विसेज फर्म ANSR के सीईओ ललित आहूजा के अनुसार, जिस टेक्नोलॉजी प्रोजेक्ट को पहले एक साल में 50 इंजीनियर्स की टीम पूरा करती थी, अब उसे एआई की मदद से 4 से 10 लोग महज चार हफ्ते में पूरा कर लेते हैं.
इस पूरे बदलाव का मतलब यह नहीं है कि नौकरियां पूरी तरह खत्म हो गई हैं, बल्कि कंपनियां अब ज्यादा स्पेशलाइज्ड रोल्स के लिए ही भर्तियां कर रही हैं. उदाहरण के लिए, सिटीग्रुप ने इस साल अपने भारतीय जीसीसी ऑपरेशन्स के लिए नेट बेसिस पर करीब 2,000 लोगों को भर्ती किया है, जबकि पिछले साल यह आंकड़ा 4,000 था.
स्पष्ट है कि भारतीय युवाओं के लिए अब केवल एक पारंपरिक डिग्री होना काफी नहीं है; उन्हें एआई के इस दौर में खुद को नए सिरे से री-स्किल करना ही होगा.
ताजा स्थिति व आगे का अपडेट
इस विकास का सीधा प्रभाव संबंधित क्षेत्र और हितधारकों पर देखा जा रहा है। घटनाक्रम पर पैनी नजर बनी हुई है।
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