पूर्वांचल में मानसून के बादल कितने ऊंचे हैं, आसमान में बादलों की कितनी परतें मौजूद हैं और बारिश कब होगी, इन सवालों के जवाब सटीक मिल सकेंगे। गोरखपुर विश्वविद्यालय में लगा सीलोमीटर आसमान की गतिविधियों की अच्छी तरह से निगरानी कर रहा है। इससे अगले वर्ष से मौसम का सटीक पूर्वानुमान मिलने लगेगा। उल्लेखनीय है कि सितंबर 2024 में गोरखपुर विश्वविद्यालय के भौतिकी विभाग में अहमदाबाद स्थित भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल) की मदद से सीलोमीटर स्थापित किया गया था। उत्तर प्रदेश में इस तरह का यह पहला उपकरण है। लेजर किरणों से काम करने वाली यह मशीन सात किलोमीटर की ऊंचाई तक बादलों की गतिविधियों को दर्ज कर रही है। खास बात यह है कि इससे पहली बार क्षेत्र में बादलों की ऊंचाई और उनकी परतों का लगातार वैद्यानिक रिकॉर्ड तैयार हो रहा है। सितंबर 2027 के बाद जुटाए गए आंकड़ों का उपयोग पूर्वानुमान में होने लगेगा। पूर्वाचल में मौसम का मिजाज अक्सर तेजी से बदलता है। मौसम का यह बदलता रुख समझने के लिए सिर्फ तापमान और बारिश के आंकड़े पर्याप्त नहीं साबित हो रहे हैं। पूर्वांचल में मौसम का मिजाज अक्सर तेजी से बदलता है। कभी अचानक बारिश होती है तो कभी बादल छाने के बावजूद बारिश नहीं होती। मौसम का यह बदलता रुख समझने के लिए सिर्फ तापमान और बारिश के आंकड़े पर्याप्त नहीं हैं। आसमान में बादल किस ऊंचाई पर हैं, उनकी कितनी परतें हैं और उनकी मौजूदगी में मौसम के साथ कितना बदलाव हो रहा है, यह जानना भी जरूरी है। सीलोमीटर से मिलने वाले आंकड़े इसी कमी को दूर करने में मदद करेंगे। सीलोमीटर से मिलने वाले आंकड़े इसी कमी को दूर करने में मदद करेंगे। सितंबर 2027 तक मिलने वाले आंकड़ों का विश्लेषण क्षेत्रीय मौसम की विशेषताओं को समझने और पूर्वानुमान में इस्तेमाल होने वाले मॉडलों को बेहतर बनाने का आधार तैयार करेगा। लेजर किरणें बताती हैं बादलों की ऊंचाई सीलोमीटर आसमान में लेजर किरणें भेजता है। ये किरणें बादलों में मौजूद पानी की छोटी बूंदों और बर्फ के कणों से टकराकर वापस लौटती हैं। मशीन यह मापती है कि प्रकाश को वापस आने में कितना समय लगा। इसी आधार पर पता चलता है कि बादल जमीन से कितनी ऊंचाई पर हैं। यह प्रक्रिया लगातार चलती रहती है, इसलिए आसमान में बादलों की स्थिति में होने वाले बदलाव भी दर्ज होते रहते हैं। अध्ययन के दौरान करीब 97 फीसदी आंकड़े उपलब्ध रहे। इनका मिलान उपग्रह से मिली तस्वीरों और मौसम का अनुमान लगाने वाले मॉडलों के आंकड़ों से भी किया जा रहा है। अब तक सटीक स्थानीय आंकड़े नहीं थे उपलब्ध गोरखपुर विश्वविद्यालय के भौतिकी विभाग में इस शौच परियोजना के प्रधान अन्वेषक प्रो. शांतनु रस्तोगी के मुताबिक, सीलोमीटर से मिलने वाले आंकड़े पूर्वी उत्तर प्रदेश के मौसम का पूर्वानुमान बेहतर बनाने में उपयोगी होंगे। अब तक क्षेत्र में बादलों की ऊंचाई और उनकी परतों से जुड़े स्थानीय आंकड़े पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं थे। परियोजना की निगरानी अहमदाबाद स्थित भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला के प्रो. सोम कुमार शर्मा भी कर रहे हैं। डॉ. प्रभु नाथ प्रसाद सह-प्रधान अन्वेषक और मीनाक्षी सिंह रिसर्च फेलो हैं। मानसून में सबसे ज्यादा छाए बादल अध्ययन में यह भी सामने आया कि आसमान में आमतौर पर बादलों की एक ही परत देखने को मिली। दो या तीन परतों वाले बादल अपेक्षाकृत बहुत कम दर्ज किए गए। बादलों की ऊंचाई में भी मौसम के साथ बदलाव मिला। मानसून से पहले बादल छह किलोमीटर से अधिक ऊंचाई पर देखे गए, जबकि मानसून, उसके बाद और सर्दियों में दो से चार किलोमीटर की ऊंचाई पर बादल अधिक रहे। इन आंकड़ों से वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिलेगी कि पूर्वांचल में अलग-अलग मौसम के दौरान बादलों का व्यवहार कैसा रहता है। आगे चलकर इसका इस्तेमाल मौसम का अनुमान लगाने वाले कंप्यूटर मॉडलों को बेहतर बनाने में किया जा सकेगा।

तापमान, बारिश और मौसम विभाग के आंकड़े

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  • •पूर्वांचल में मानसून के बादल कितने ऊंचे हैं, आसमान में बादलों की कितनी परतें मौजूद हैं और बारिश कब होगी, इन सवालों के जवाब सटीक मिल सकेंगे। गोरखपुर विश्वविद्यालय में लगा सीलोमीटर आसमान की गतिविधियों की अच्छी तरह से निगरानी कर रहा है। इससे अगले वर्ष से मौसम का सटीक पूर्वानुमान मिलने लगेगा। उल्लेखनीय है कि सितंबर 2024 में गोरखपुर विश्वविद्यालय के भौतिकी विभाग में अहमदाबाद स्थित भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल) की मदद से सीलोमीटर स्थापित किया गया था। उत्तर प्रदेश में इस तरह का यह पहला उपकरण है। लेजर किरणों से काम करने वाली यह मशीन सात किलोमीटर की ऊंचाई तक बादलों की गतिविधियों को दर्ज कर रही है। खास बात यह है कि इससे पहली बार क्षेत्र में बादलों की ऊंचाई और उनकी परतों का लगातार वैद्यानिक रिकॉर्ड तैयार हो रहा है। सितंबर 2027 के बाद जुटाए गए आंकड़ों का उपयोग पूर्वानुमान में होने लगेगा। पूर्वाचल में मौसम का मिजाज अक्सर तेजी से बदलता है। मौसम का यह बदलता रुख समझने के लिए सिर्फ तापमान और बारिश के आंकड़े पर्याप्त नहीं साबित हो रहे हैं। पूर्वांचल में मौसम का मिजाज अक्सर तेजी से बदलता है। कभी अचानक बारिश होती है तो कभी बादल छाने के बावजूद बारिश नहीं होती। मौसम का यह बदलता रुख समझने के लिए सिर्फ तापमान और बारिश के आंकड़े पर्याप्त नहीं हैं। आसमान में बादल किस ऊंचाई पर हैं, उनकी कितनी परतें हैं और उनकी मौजूदगी में मौसम के साथ कितना बदलाव हो रहा है, यह जानना भी जरूरी है। सीलोमीटर से मिलने वाले आंकड़े इसी कमी को दूर करने में मदद करेंगे। सीलोमीटर से मिलने वाले आंकड़े इसी कमी को दूर करने में मदद करेंगे। सितंबर 2027 तक मिलने वाले आंकड़ों का विश्लेषण क्षेत्रीय मौसम की विशेषताओं को समझने और पूर्वानुमान में इस्तेमाल होने वाले मॉडलों को बेहतर बनाने का आधार तैयार करेगा। लेजर किरणें बताती हैं बादलों की ऊंचाई सीलोमीटर आसमान में लेजर किरणें भेजता है। ये किरणें बादलों में मौजूद पानी की छोटी बूंदों और बर्फ के कणों से टकराकर वापस लौटती हैं। मशीन यह मापती है कि प्रकाश को वापस आने में कितना समय लगा। इसी आधार पर पता चलता है कि बादल जमीन से कितनी ऊंचाई पर हैं। यह प्रक्रिया लगातार चलती रहती है, इसलिए आसमान में बादलों की स्थिति में होने वाले बदलाव भी दर्ज होते रहते हैं। अध्ययन के दौरान करीब 97 फीसदी आंकड़े उपलब्ध रहे। इनका मिलान उपग्रह से मिली तस्वीरों और मौसम का अनुमान लगाने वाले मॉडलों के आंकड़ों से भी किया जा रहा है। अब तक सटीक स्थानीय आंकड़े नहीं थे उपलब्ध गोरखपुर विश्वविद्यालय के भौतिकी विभाग में इस शौच परियोजना के प्रधान अन्वेषक प्रो. शांतनु रस्तोगी के मुताबिक, सीलोमीटर से मिलने वाले आंकड़े पूर्वी उत्तर प्रदेश के मौसम का पूर्वानुमान बेहतर बनाने में उपयोगी होंगे। अब तक क्षेत्र में बादलों की ऊंचाई और उनकी परतों से जुड़े स्थानीय आंकड़े पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं थे। परियोजना की निगरानी अहमदाबाद स्थित भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला के प्रो. सोम कुमार शर्मा भी कर रहे हैं। डॉ. प्रभु नाथ प्रसाद सह-प्रधान अन्वेषक और मीनाक्षी सिंह रिसर्च फेलो हैं। मानसून में सबसे ज्यादा छाए बादल अध्ययन में यह भी सामने आया कि आसमान में आमतौर पर बादलों की एक ही परत देखने को मिली। दो या तीन परतों वाले बादल अपेक्षाकृत बहुत कम दर्ज किए गए। बादलों की ऊंचाई में भी मौसम के साथ बदलाव मिला। मानसून से पहले बादल छह किलोमीटर से अधिक ऊंचाई पर देखे गए, जबकि मानसून, उसके बाद और सर्दियों में दो से चार किलोमीटर की ऊंचाई पर बादल अधिक रहे। इन आंकड़ों से वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिलेगी कि पूर्वांचल में अलग-अलग मौसम के दौरान बादलों का व्यवहार कैसा रहता है। आगे चलकर इसका इस्तेमाल मौसम का अनुमान लगाने वाले कंप्यूटर मॉडलों को बेहतर बनाने में किया जा सकेगा।

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विशेषज्ञों और पर्यवेक्षकों के अनुसार इस कदम के महत्वपूर्ण परिणाम सामने आ सकते हैं। आगे की आधिकारिक घोषणाओं की प्रतीक्षा है।