अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की फ्लोरिडा स्थित संपत्ति में रखे गोपनीय दस्तावेजों की जांच में शामिल एफबीआई कर्मचारियों ने गुरुवार को मुकदमा दायर किया। इन कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया गया था। अब वे अपनी नौकरी वापस चाहते हैं। उन्होंने नौकरी से निकाले जाने की कार्रवाई को गैरकानूनी बताया है। उनका कहना है कि यह कार्रवाई 'राजनीतिक बदले' के तहत की गई। मामला क्या है? इस मुकदमे से एफबीआई निदेशक काश पटेल के नेतृत्व में कर्मचारियों को बड़े पैमाने पर नौकरी से निकाले जाने के खिलाफ कानूनी चुनौतियां और बढ़ गई हैं। इन कर्मचारियों ने राष्ट्रपति ट्रंप से जुड़ी जांचों में हिस्सा लिया था या फिर उन्हें ट्रंप प्रशासन के हितों के खिलाफ माना गया था। यह मुकदमा वाशिंगटन की संघीय अदालत में दायर किया गया है। इसमें नौ एजेंटों, खुफिया विश्लेषकों और संचालन से जुड़े विशेषज्ञ कर्मचारियों की ओर से पैरवी की गई है। इन सभी को फरवरी में नौकरी से निकाल दिया गया था। इससे पहले उन एजेंटों को भी हटाया गया था, जिन्होंने 2020 के राष्ट्रपति चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी के जो बाइडन से हार के नतीजे पलटने की ट्रंप की कोशिशों की जांच की थी। काश पटेल ने क्या कहा था? पटेल ने कांग्रेस (संसद) में गवाही के दौरान कहा था कि जिन कर्मचारियों को उन्होंने नौकरी से निकाला, उन्होंने एफबीआई का 'गलत इस्तेमाल' किया था। लेकिन मुकदमे में एजेंटों ने इस आरोप को खारिज किया है। उन्होंने कहा कि उन सभी के पास मिलाकर एफबीआई में एक सदी से भी ज्यादा समय का शानदार और गैर-राजनीतिक सेवा अनुभव था। इस दौरान उन्होंने बोस्टन मैराथन बम धमाके के बाद की कार्रवाई, बंधकों को छुड़ाने और 2024 में पेंसिल्वेनिया के बटलर में ट्रंप की हत्या की कोशिश की जांच जैसे मामलों में काम किया था। मुकदमे में कहा गया है कि इन कर्मचारियों को नौकरी से निकाले जाने से अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा को 'ऐसा नुकसान हुआ है, जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती'। उनके वकीलों मार्गरेट डोनोवन, एब लोवेल और रेबेका टिनियो ने एक बयान में कहा, 'अपनी सेवा के बदले उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उन्होंने अपना काम किया। उन्होंने हमेशा की तरह बिना किसी पक्षपात या भेदभाव के तथ्यों और कानून के आधार पर काम किया। इस प्रशासन की नजर में यह अपराध है। लेकिन बाकी लोगों की नजर में यह बहादुरी का काम है'। बयान में आगे कहा गया, यह मुकदमा साबित करेगा कि उन्हें गैरकानूनी तरीके से नौकरी से निकाला गया। साथ ही, कानून के शासन पर इस खुले हमले के लिए प्रशासन को जवाबदेह ठहराया जाएगा।  ट्रंप पर कौन-कौन से आपराधिक आरोप लगे थे? मुकदमे में ट्रंप के खिलाफ लगाए गए आरोपों का विस्तार से जिक्र किया गया है। इसमें बताया गया है कि ट्रंप व्हाइट हाउस छोड़ने के बाद कई गोपनीय दस्तावेज अपने साथ ले गए थे। उन्होंने फ्लोरिडा के पाम बीच स्थित अपनी मार-ए-लागो संपत्ति में दर्जनों गोपनीय दस्तावेज अनुचित तरीके से रखे थे। उन्होंने ये दस्तावेज ऐसे लोगों को भी दिखाए थे, जिन्हें उन्हें देखने की अनुमति नहीं थी। साथ ही, एफबीआई की ओर से दस्तावेज वापस लेने की कोशिशों में बाधा डालने का भी आरोप लगाया गया। इस जांच के दौरान 2022 में एफबीआई ने मार-ए-लागो में बड़ी तलाशी ली थी। इस दौरान गोपनीय दस्तावेज बरामद किए गए थे। बाद में फ्लोरिडा की संघीय अदालत में ट्रंप के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया गया। इसमें उन पर कई गंभीर आपराधिक आरोप लगाए गए थे। ट्रंप ने किसी भी गलत काम से इनकार किया था। साल 2024 में यह मामला खारिज कर दिया गया था। ट्रंप की ओर से नियुक्त जज एलीन कैनन ने यह फैसला दिया था। उन्होंने कहा था कि आरोप दाखिल करने वाले विशेष वकील जैक स्मिथ की नियुक्ति बाइडन प्रशासन के न्याय विभाग ने गैरकानूनी तरीके से की थी। क्या मर्जी से जांच में शामिल हुए थे कर्मचारी? मुकदमे के मुताबिक, एफबीआई के इन नौ कर्मचारियों ने खुद इस जांच में शामिल होने की इच्छा नहीं जताई थी। उन्हें उनके काम के हिस्से के रूप में जांच सौंपी गई थी। वे विशेष खुफिया जानकारी और विदेशी जासूसी से जुड़े दलों में काम करते थे। इसके बावजूद उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। मुकदमे में कहा गया है कि ऐसा इस बेबुनियाद धारणा के कारण हुआ कि कानून लागू करने के लिए अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए उन्होंने ट्रंप के प्रति राजनीतिक और व्यक्तिगत वफादारी की उन अपेक्षाओं का उल्लंघन किया, जिनकी मांग आरोपित अधिकारियों ने की थी। ये भी पढ़ें: 'दखलंदाजी स्वीकार नहीं': अमेरिकी सांसद प्रमिला जयपाल पर भड़के भारतीय राजदूत क्वात्रा; क्या है पूरा मामला? जांच को राजनीतिक रंग देने का आरोप लगाया मुकदमे में कहा गया है, प्लाज्मिक इको जांच में वादियों के काम को राजनीतिक उद्देश्यों के लिए एफबीआई के गलत इस्तेमाल के रूप में पेश करके आरोपित अधिकारियों ने गलत तरीके से यह मान लिया कि वे वादियों की व्यक्तिगत राजनीतिक सोच जानते हैं। इसी धारणा के आधार पर उन्होंने गैरकानूनी कार्रवाई की'।  इस जांच के लिए एफबीआई ने 'प्लाज्मिक इको' को कोड नाम दिया था। यह जांच गोपनीय दस्तावेजों से जुड़ी थी। मुकदमे में आगे कहा गया है, इससे भी बुरी बात यह है कि आरोपित अधिकारियों ने गलत निष्कर्ष निकाला कि कर्मचारियों की व्यक्तिगत राजनीतिक सोच ने उनके काम को प्रभावित किया या उनके काम का आधार वही सोच थी।  कर्मचारी अदालत से क्या मांग कर रहे हैं? मुकदमे में कई मांगें की गई हैं। इनमें एफबीआई में कर्मचारियों को दोबारा नौकरी पर रखना, नौकरी से निकाले जाने के बाद का बकाया वेतन देना और अदालत से यह घोषित करने का अनुरोध शामिल है कि उन्हें नौकरी से निकालने की कार्रवाई गैरकानूनी थी। नौकरी से निकाले गए कर्मचारियों के वकीलों का कहना है कि फरवरी में कार्रवाई होने से काफी पहले ही उनके मुवक्किलों का भविष्य तय कर दिया गया था। उन्होंने इस कार्रवाई को लंबे समय से चल रही बदले की मुहिम का अंतिम नतीजा बताया है। उनके मुताबिक, 2025 में ट्रंप के दोबारा व्हाइट हाउस लौटने के बाद यह मुहिम तेज हो गई थी।

मुख्य पुष्ट तथ्य और जांच के अहम बिंदु

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  • •अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की फ्लोरिडा स्थित संपत्ति में रखे गोपनीय दस्तावेजों की जांच में शामिल एफबीआई कर्मचारियों ने गुरुवार को मुकदमा दायर किया। इन कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया गया था। अब वे अपनी नौकरी वापस चाहते हैं। उन्होंने नौकरी से निकाले जाने की कार्रवाई को गैरकानूनी बताया है। उनका कहना है कि यह कार्रवाई 'राजनीतिक बदले' के तहत की गई। मामला क्या है? इस मुकदमे से एफबीआई निदेशक काश पटेल के नेतृत्व में कर्मचारियों को बड़े पैमाने पर नौकरी से निकाले जाने के खिलाफ कानूनी चुनौतियां और बढ़ गई हैं। इन कर्मचारियों ने राष्ट्रपति ट्रंप से जुड़ी जांचों में हिस्सा लिया था या फिर उन्हें ट्रंप प्रशासन के हितों के खिलाफ माना गया था। यह मुकदमा वाशिंगटन की संघीय अदालत में दायर किया गया है। इसमें नौ एजेंटों, खुफिया विश्लेषकों और संचालन से जुड़े विशेषज्ञ कर्मचारियों की ओर से पैरवी की गई है। इन सभी को फरवरी में नौकरी से निकाल दिया गया था। इससे पहले उन एजेंटों को भी हटाया गया था, जिन्होंने 2020 के राष्ट्रपति चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी के जो बाइडन से हार के नतीजे पलटने की ट्रंप की कोशिशों की जांच की थी। काश पटेल ने क्या कहा था? पटेल ने कांग्रेस (संसद) में गवाही के दौरान कहा था कि जिन कर्मचारियों को उन्होंने नौकरी से निकाला, उन्होंने एफबीआई का 'गलत इस्तेमाल' किया था। लेकिन मुकदमे में एजेंटों ने इस आरोप को खारिज किया है। उन्होंने कहा कि उन सभी के पास मिलाकर एफबीआई में एक सदी से भी ज्यादा समय का शानदार और गैर-राजनीतिक सेवा अनुभव था। इस दौरान उन्होंने बोस्टन मैराथन बम धमाके के बाद की कार्रवाई, बंधकों को छुड़ाने और 2024 में पेंसिल्वेनिया के बटलर में ट्रंप की हत्या की कोशिश की जांच जैसे मामलों में काम किया था। मुकदमे में कहा गया है कि इन कर्मचारियों को नौकरी से निकाले जाने से अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा को 'ऐसा नुकसान हुआ है, जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती'। उनके वकीलों मार्गरेट डोनोवन, एब लोवेल और रेबेका टिनियो ने एक बयान में कहा, 'अपनी सेवा के बदले उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उन्होंने अपना काम किया। उन्होंने हमेशा की तरह बिना किसी पक्षपात या भेदभाव के तथ्यों और कानून के आधार पर काम किया। इस प्रशासन की नजर में यह अपराध है। लेकिन बाकी लोगों की नजर में यह बहादुरी का काम है'। बयान में आगे कहा गया, यह मुकदमा साबित करेगा कि उन्हें गैरकानूनी तरीके से नौकरी से निकाला गया। साथ ही, कानून के शासन पर इस खुले हमले के लिए प्रशासन को जवाबदेह ठहराया जाएगा।  ट्रंप पर कौन-कौन से आपराधिक आरोप लगे थे? मुकदमे में ट्रंप के खिलाफ लगाए गए आरोपों का विस्तार से जिक्र किया गया है। इसमें बताया गया है कि ट्रंप व्हाइट हाउस छोड़ने के बाद कई गोपनीय दस्तावेज अपने साथ ले गए थे। उन्होंने फ्लोरिडा के पाम बीच स्थित अपनी मार-ए-लागो संपत्ति में दर्जनों गोपनीय दस्तावेज अनुचित तरीके से रखे थे। उन्होंने ये दस्तावेज ऐसे लोगों को भी दिखाए थे, जिन्हें उन्हें देखने की अनुमति नहीं थी। साथ ही, एफबीआई की ओर से दस्तावेज वापस लेने की कोशिशों में बाधा डालने का भी आरोप लगाया गया। इस जांच के दौरान 2022 में एफबीआई ने मार-ए-लागो में बड़ी तलाशी ली थी। इस दौरान गोपनीय दस्तावेज बरामद किए गए थे। बाद में फ्लोरिडा की संघीय अदालत में ट्रंप के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया गया। इसमें उन पर कई गंभीर आपराधिक आरोप लगाए गए थे। ट्रंप ने किसी भी गलत काम से इनकार किया था। साल 2024 में यह मामला खारिज कर दिया गया था। ट्रंप की ओर से नियुक्त जज एलीन कैनन ने यह फैसला दिया था। उन्होंने कहा था कि आरोप दाखिल करने वाले विशेष वकील जैक स्मिथ की नियुक्ति बाइडन प्रशासन के न्याय विभाग ने गैरकानूनी तरीके से की थी। क्या मर्जी से जांच में शामिल हुए थे कर्मचारी? मुकदमे के मुताबिक, एफबीआई के इन नौ कर्मचारियों ने खुद इस जांच में शामिल होने की इच्छा नहीं जताई थी। उन्हें उनके काम के हिस्से के रूप में जांच सौंपी गई थी। वे विशेष खुफिया जानकारी और विदेशी जासूसी से जुड़े दलों में काम करते थे। इसके बावजूद उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। मुकदमे में कहा गया है कि ऐसा इस बेबुनियाद धारणा के कारण हुआ कि कानून लागू करने के लिए अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए उन्होंने ट्रंप के प्रति राजनीतिक और व्यक्तिगत वफादारी की उन अपेक्षाओं का उल्लंघन किया, जिनकी मांग आरोपित अधिकारियों ने की थी। ये भी पढ़ें: 'दखलंदाजी स्वीकार नहीं': अमेरिकी सांसद प्रमिला जयपाल पर भड़के भारतीय राजदूत क्वात्रा; क्या है पूरा मामला? जांच को राजनीतिक रंग देने का आरोप लगाया मुकदमे में कहा गया है, प्लाज्मिक इको जांच में वादियों के काम को राजनीतिक उद्देश्यों के लिए एफबीआई के गलत इस्तेमाल के रूप में पेश करके आरोपित अधिकारियों ने गलत तरीके से यह मान लिया कि वे वादियों की व्यक्तिगत राजनीतिक सोच जानते हैं। इसी धारणा के आधार पर उन्होंने गैरकानूनी कार्रवाई की'।  इस जांच के लिए एफबीआई ने 'प्लाज्मिक इको' को कोड नाम दिया था। यह जांच गोपनीय दस्तावेजों से जुड़ी थी। मुकदमे में आगे कहा गया है, इससे भी बुरी बात यह है कि आरोपित अधिकारियों ने गलत निष्कर्ष निकाला कि कर्मचारियों की व्यक्तिगत राजनीतिक सोच ने उनके काम को प्रभावित किया या उनके काम का आधार वही सोच थी।  कर्मचारी अदालत से क्या मांग कर रहे हैं? मुकदमे में कई मांगें की गई हैं। इनमें एफबीआई में कर्मचारियों को दोबारा नौकरी पर रखना, नौकरी से निकाले जाने के बाद का बकाया वेतन देना और अदालत से यह घोषित करने का अनुरोध शामिल है कि उन्हें नौकरी से निकालने की कार्रवाई गैरकानूनी थी। नौकरी से निकाले गए कर्मचारियों के वकीलों का कहना है कि फरवरी में कार्रवाई होने से काफी पहले ही उनके मुवक्किलों का भविष्य तय कर दिया गया था। उन्होंने इस कार्रवाई को लंबे समय से चल रही बदले की मुहिम का अंतिम नतीजा बताया है। उनके मुताबिक, 2025 में ट्रंप के दोबारा व्हाइट हाउस लौटने के बाद यह मुहिम तेज हो गई थी।

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