## सुप्रीम कोर्ट में मतदाता सूची विवाद पर तीखी बहस

देश के सर्वोच्च न्यायालय में मतदाता सूची से वास्तविक नागरिकों के नाम काटे जाने के गंभीर मुद्दे पर महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने निर्वाचन तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए स्पष्ट किया कि मताधिकार केवल एक वैधानिक अधिकार नहीं, बल्कि नागरिक की लोकतांत्रिक पहचान का आधार है।

अदालत ने कहा कि प्रशासनिक लापरवाही या तकनीकी त्रुटियों के चलते किसी भी योग्य नागरिक को उसके सबसे बुनियादी अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

## जस्टिस भुइयां की मुख्य टिप्पणियां

पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान कई सख्त बिंदु रेखांकित किए:

- **प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत:** किसी भी व्यक्ति का नाम हटाने से पहले उसे लिखित नोटिस देकर अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। - **एकतरफा कार्रवाई अस्वीकार्य:** सिर्फ 'स्थानीय जांच' के नाम पर फॉर्म 7 के दुरुपयोग को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। - **प्रशासनिक जवाबदेही:** यदि किसी वास्तविक मतदाता का नाम जानबूझकर या दुर्भावना से हटाया गया पाया जाता है, तो संबंधित बीएलओ और निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी पर विभागीय व कानूनी कार्रवाई होगी।

## चुनाव सुधारों पर इसका दूरगामी असर

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस रुख से देश भर में मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी। चुनाव आयोग को अब नाम विलोपन की प्रत्येक प्रविष्टि को सार्वजनिक पोर्टल पर कारण सहित दर्ज करना होगा।