सर्वोच्च न्यायालय ने देश में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर सरकारों और पुलिस प्रशासन की ढिलाई पर कड़ा असंतोष व्यक्त किया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत भयमुक्त जीवन जीने का अधिकार देश की प्रत्येक महिला और बेटी का मौलिक अधिकार है।
अदालत ने कहा कि यह बेहद चिंताजनक है कि आज भी महिलाएं रात के समय घर से बाहर निकलते समय असुरक्षा महसूस करती हैं।
## शीर्ष अदालत के कड़े दिशा-निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और सभी राज्यों के पुलिस प्रमुखों को निम्नलिखित बिंदुओं पर तत्काल अनुपालन रिपोर्ट सौंपने को कहा है:
- **डार्क स्पॉट्स का खात्मा:** सभी शहरों और कस्बों में अंधेरे वाले स्थानों की तुरंत पहचान कर वहां 24 घंटे चलने वाली हाई-मास्ट लाइट्स लगाई जाएं। - **सार्वजनिक परिवहन की निगरानी:** सभी बसों, टैक्सियों और ऑटो में पैनिक बटन और जीपीएस ट्रैकिंग का अनिवार्य सत्यापन किया जाए। - **महिला पुलिस गश्त में वृद्धि:** संवेदनशील इलाकों और देर रात चलने वाले मेट्रो स्टेशनों व बस अड्डों के बाहर महिला पुलिसकर्मियों की पीसीआर वैन तैनात की जाएं।
## 'कागजी आदेशों से आगे बढ़े प्रशासन'
पीठ ने टिप्पणी की कि हर बड़ी घटना के बाद जांच समितियां और नीतियां बन जाती हैं, लेकिन उनका जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन शून्य रहता है। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि 4 सप्ताह के भीतर प्रगति रिपोर्ट पेश नहीं की गई तो संबंधित मुख्य सचिवों को व्यक्तिगत रूप से तलब किया जाएगा।
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